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प्रयागराज को तीर्थराज कहा जाता है, समस्त तीर्थाे के ये अधिपति है

तीर्थराज प्रयागराज
-अभिनय सेठ 
ऋगवेद के समय से ही प्रयाग को सबसे पवित्र तीर्थस्थान माना जाता है। इसका मुख्य कारण यहां पर गंगा, यमुना के संगम का होना है। ऐसा माना जाता है कि संगम के किनारे मृत्यु होने से मानव जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है और मोक्ष को प्राप्त करता है। महाभारत, अग्निपुराण, पदमपुराण और सूर्यपुराण में भी प्रयाग को पवित्र तीर्थस्थल माना गया है। विनय पत्रिका में ऐसा उल्लेख किया गया है कि गौतम बुद्ध ने प्रयाग की यात्रा लगभग 450 ईसा पूर्व में की थी। प्रयागराज को तीर्थराज कहा जाता है। समस्त तीर्थाे के ये अधिपति है। सातों पुरियां इनकी रानियां कही जाती हैं।
श्लोक-
अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका ।
पुरी द्वारावती चौव सप्तैता मोक्षदायिकाः॥
अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, काञ्चीपुरम, अवन्तिका (उज्जैन), द्वारिकापुरी, ये सात मोक्षदायी (पुरियाँ) हैं।)

प्रयागराज को तीर्थराज कहा जाता है, समस्त तीर्थाे के ये अधिपति है।  गंगा-यमुना की धारा ने पूरे प्रयाग क्षेत्र को तीन भागों में बांट दिया है। ये तीनों भाग अग्निस्वरूप् यज्ञवेदी माने जाते हैं। इनमें गंगा-यमुना पार के भाग को दक्ष्ज्ञिणाग्नि माना जाता है। इन भागों में पवित्र होकर एक-एक रात्रि निवास से इन अग्नियों की उपासना का फल मिलता है। प्रयागराज की गणना भारत के प्राचीनतम तीर्थ स्थानों में की जाती है। त्रिस्थली में प्रयाग एक तीर्थ स्थल है। कहा जाता है कि यहां अनगिनत यज्ञों का आयोजन हुआ था, इसलिए इसे प्रयाग कहते है। प्रयाग में प्रति माघ मास में मेला लगता है। इसे कल्पवास कहते हैं। बहुत-से श्रद्धालु यात्री प्रतिवर्ष गंगा-यमुना के मध्य में कल्पवास करते हैं। प्रति बारहवें वर्ष जब वृष राषि में और सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तभी प्रयाग में कुंभ का मेला लगता है। कुंभ से छठे वर्ष अर्धकुंभी मेला लगता है। प्रसिद्ध है कि सम्राट हर्षवर्धन प्रयाग में प्रति पांचवें वर्ष धर्म सभा का आयोजन करते थे और उसमें अपना सर्वस्व दान कर दिया करते थे।

प्रयागराज की गणना भारत के प्राचीनतम तीर्थ स्थानों में की जाती है। त्रिस्थली में प्रयाग एक तीर्थ स्थल है।  हिन्दू मान्यता है कि, सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि कार्य पूर्ण होने के बाद सबसे प्रथम यज्ञ यहां किया था। इसी प्रथम यज्ञ के ‘प्र’ और ‘याग’ अर्थात यज्ञ की सन्धि द्वारा प्रयाग नाम बना। ऋग्वेद और कुछ पुराणों में भी इस स्थान का उल्लेख ‘प्रयाग’ के रूप में किया गया है। 

हिन्दी भाषा में प्रयाग का शाब्दिक अर्थ ‘नदियों का संगम’ भी है - यहीं पर गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का संगम होता है। अक्सर ‘पांच प्रयागों का राजा’ कहलाने के कारण इस नगर को प्रयागराज भी कहा जाता रहा है। अनगिनत यज्ञों का आयोजन होने के कारण भी इसे प्रयाग कहते है। 

प्रयाग में प्रति माघ मास में मेला लगता है। इसे कल्पवास कहते हैं। बहुत-से श्रद्धालु यात्री प्रतिवर्ष गंगा-यमुना के मध्य में कल्पवास करते हैं। प्रति बारहवें वर्ष जब वृष राषि में और सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तभी प्रयाग में कुंभ का मेला लगता है। कुंभ से छठे वर्ष अर्धकुंभी मेला लगता है। प्रसिद्ध है कि सम्राट हर्षवर्धन प्रयाग में प्रति पांचवें वर्ष धर्म सभा का आयोजन करते थे और उसमें अपना सर्वस्व दान कर दिया करते थे।

भारत के उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में स्थित एक नगर, इलाहाबाद जिला का प्रशासनिक मुख्यालय तथा हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। इसका प्राचीन नाम ‘प्रयाग’ है। हिन्दू धर्मग्रन्थों में वर्णित प्रयाग स्थल पवित्रतम नदी गंगा और यमुना के संगम पर स्थित है। यहीं सरस्वती नदी गुप्त रूप से संगम में मिलती है, अतः ये त्रिवेणी संगम कहलाता है, जहां प्रत्येक बारह वर्ष में कुंभ मेला लगता है। यहाँ हर छह वर्षों में अर्द्धकुम्भ और हर बारह वर्षों पर कुम्भ मेले का आयोजन होता है जिसमें विश्व के विभिन्न कोनों से करोड़ों श्रद्धालु पतितपावनी गंगा, यमुना और सरस्वती के पवित्र त्रिवेणी संगम में आस्था की डुबकी लगाने आते हैं। अतः इस नगर को संगमनगरी, कुंभनगरी, तंबूनगरी आदि नामों से भी जाना जाता है। 

सन् 1500 की शताब्दी में मुस्लिम राजा द्वारा इस शहर का नाम प्रयागराज से बदलकर इलाहाबाद किया था जिसे सन् अक्टूबर 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वापस बदलकर प्रयागराज कर दिया। इस पावन नगरी के अधिष्ठाता भगवान श्री विष्णु स्वयं हैं और वे यहाँ वेणीमाधव रूप में विराजमान हैं। भगवान के यहाँ बारह स्वरूप विद्यमान हैं जिन्हें ‘द्वादश माधव’ कहा जाता है। सबसे बड़े हिन्दू सम्मेलन महाकुंभ की चार स्थलियों में से एक है, शेष तीन हरिद्वार, उज्जैन एवं नासिक हैं।

प्रयागराज (इलाहाबाद) में कई महत्त्वपूर्ण राज्य सरकार के कार्यालय स्थित हैं, जैसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान (एजी ऑफ़िस), उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा आयोग (पी.एस.सी), राज्य पुलिस मुख्यालय, उत्तर मध्य रेलवे मुख्यालय, केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का क्षेत्रीय कार्यालय एवं उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद कार्यालय है। 

प्रयाग में गंगा-यमुना के संगम में स्नान करके प्राणी पापों से मुक्त होकर स्वर्ग का अधिकारी हो जाता है। इस क्षेत्र में देह त्यागने वाले प्राणी की मुक्ति हो जाती है - ऐसा पुराणों मेें बताया गया है।

पद्मपुराण के अनुसार- ‘जैसे ग्रहों में सूर्य तथा ताराओं में चंद्रमा श्रेष्ठ है, वैसे ही तीर्थाे में प्रयाग सर्वाेत्तम है। जो पुरूष यहां के अक्षयवट का दर्शन करता है, उसके दर्शन-मात्र से ब्रम्हहत्या नष्ट हो जाती है। इस अक्षय वट के पत्ते पर भगवान विष्णु शयन करते है।’ और इस वट वृक्ष के पत्ते पर बाल स्वरूप लेटकर मार्कण्डे ऋषि को 12 वर्ष माया के दर्शन कराये थे। ऐसा पुराणों में वर्णित है। प्रयागराज में भगवान माधव नाम से सुखपूर्वक नित्य विराजते हैं। उनका दर्शन करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य महापापों से मुक्त हो जाता है। गोघाली, चांडाल, शठ, दृष्ट-चित्त, बालघाती या मूर्ख, जो भी यहां मरता है, वह चतुर्भुज होकर अनंत काल तक बैकुठ में निवास करता है। माघ मास में जो व्यक्ति प्रयागराज में स्नान करता है, उसके पुण्य फल की कोई गणना नहीं। प्रयाग में गंगा-यमुना के संगम में स्नान करके प्राणी पापों से मुक्त होकर स्वर्ग का अधिकारी हो जाता है। इस क्षेत्र में देह त्यागने वाले प्राणी की मुक्ति हो जाती है - ऐसा पुराणों मेें बताया गया है।

पद्मपुराण के अनुसार- ‘जैसे ग्रहों में सूर्य तथा ताराओं में चंद्रमा श्रेष्ठ है, वैसे ही तीर्थाे में प्रयाग सर्वाेत्तम है। जो पुरूष यहां के अक्षयवट का दर्शन करता है, उसके दर्शन-मात्र से ब्रम्हहत्या नष्ट हो जाती है। इस अक्षय वट के पत्ते पर भगवान विष्णु शयन करते है।’ और इस वट वृक्ष के पत्ते पर बाल स्वरूप लेटकर मार्कण्डे ऋषि को 12 वर्ष माया के दर्शन कराये थे। ऐसा पुराणों में वर्णित है। प्रयागराज में भगवान माधव नाम से सुखपूर्वक नित्य विराजते हैं। उनका दर्शन करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य महापापों से मुक्त हो जाता है। गोघाली, चांडाल, शठ, दृष्ट-चित्त, बालघाती या मूर्ख, जो भी यहां मरता है, वह चतुर्भुज होकर अनंत काल तक बैकंुठ में निवास करता है। माघ मास में जो व्यक्ति प्रयागराज में स्नान करता है, उसके पुण्य फल की कोई गणना नहीं।

नोटः यदि आपके पास भी प्रयागराज के इतिहास से जुड़ी कोई रोचक जानकारी या किस्सें हैं। तो आप हमें ई-मेल के माध्यम से भेज सकते है। हम सामग्री के अनुसार, उसे नाम व तस्वीर सहित प्रकाशित करेंगें। ई-मेल-nsnewsonline@gmail.com

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