तीर्थराज-प्रयागराज
-अभिनय सेठ
पौराणिक कथा के अनुसार महाकुम्भ का सम्बन्ध अमृत मंथन अर्थात सागर के मंथन द्वारा अमृत प्रकट होने की कथा से हैं। इस कथा के अनुसार एक समय में देवताओं एवं असुरों ने समुद्र के मंथन तथा उस के द्वारा प्रकट होने वाले सभी रत्नों को आपस में बांटने का निर्णय किया। उनके बीच इन रत्नों के बंटवारे को लेकर अत्यंत बार मतभेद हुए। समुद्र के मंथन द्वारा जो सबसे मूल्यवान रत्न निकला वह था, ‘अमृत’। उसे पाने के लिए देवताओं और राक्षसों दोनों ने इच्छा प्रकट की। अमृत का पान करने वाला व्यक्ति अमर हो जाता है अर्थात् सर्वशक्तिमान और अविनाशी हो जाता है। देवताओं को यह कदापि स्वीकार नहीं था कि असुर अमर हो जाएं एवं संसार में पाप का साम्राज्य फैले। समुद्र मंथन के बाद जब अमृत प्रकट हुआ तब देवता और राक्षस अमृत के पात्र के लिए युद्ध करने लगे तब भगवान विष्णु ने मोहिनी नामक अप्सरा का रूप लेकर अमृत पात्र को असुरों से दूर किया। असुरों से अमृत को बचाने हेतु भगवान विष्णु ने वह पात्र अपने वाहन गरूड़ को दे दिया। असुरों ने जब गरूड़ से वह पात्र छीनने की चेष्ठा की तो उस पात्र में से अमृत की कुछ बूंदें छलक कर प्रयागराज, नासिक, हरिद्वार और उज्जैन में गिरी तभी से प्रत्येक 12 वर्षो के अंतराल पर इन स्थानों पर कुम्भ मेला आयोजित किया जाता है। मंथन के द्वारा दिव्य अश्व, हाथी, पवित्र गौ आदि उत्पन्न हुए एवं भयानक विष भी निकला जिसके द्वारा संपूर्ण सृष्टि का विनाश हो सकता था। तब भगवान शिव भोलेनाथ ने उस भयानक विषको निगल कर अपने कंठ में धारण कर संसार की रक्षा की थी। मंथन के द्वारा उत्पन्न हुई प्रत्येक वस्तु यहां तक कि चार वेद भी विभिन्न देवताओं को दे दिए गए थे। असुरों की दृष्टि तो अमृत पर थी जैसे ही अमृत प्रकट हुआ उसे पाने के लिए असुरों ने देवताओं के विरूद्ध चाल चली। राहु नामक असुर ने छल से अमृत का पान कर लिया तब श्रीहरि विष्णु ने अपने सुरदर्शन से उसका सिर काट दिया। परन्तु अमृत के प्रभाव से उसका सिर जीवित रहा एक मान्यता के अनुसार जब भी राहू सूर्य को निगल लेता है तब सूर्य ग्रहण होता है। अमृत कलश के लिए देवताओं एवं असुरों के बीच हुए भागदौड़ के दौरान कलश से कई बार अमृत की बूंदे छलक कर धरती पर गिरी। वे सभी स्थान कुम्भ मेले के लिए तीर्थ बन गए।
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